कुलपति की कलम से
केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा की स्थापना 2009 में संसद अधिनियम के तहत हुई है। विश्वविद्यायल महेन्दरगढ़ दारी रोड पर (जाट-पाली) में 500 एकड़ से अधिक के भू-क्षेत्र पर स्थित है। वर्तमान में नरनौल में शासकीय बी.एड कालेज के नवीन भवन में विश्वविद्यालय का अस्थाई कैम्पस संचालित है। स्थायी कैम्पस के निर्माण तथा विकास का कार्य जाट- पाली गांव महेन्दरगढ़ में पहले ही प्रारंभ हो चुका है तथा गति के साथ प्रक्रिया चालू है। विश्वविद्यालय में न केवल दूरदर्शिता एवं समग्रता है, बल्कि जानकारी व नवीनता के सृजन के उत्तरदायित्व के साथ पढ़ाई की जाती है। आज के जमाने में ज्ञान व उन्नयन के सृजन के लिए संस्थागत तथा प्रक्रियात्मक जिम्मेदारी, अधिक अहम है जो जीवन के हर पहलू चाहे वह सामाजिक हो चाहे आर्थिक हो या सांस्कृतिक, सभी क्षेत्रा में बहदर्शिता का उदाहरण पेश करती है तथा इसके लिए दो अति महत्वपूर्ण विकास जैसे भूगर्भीय सीमाओं को खत्म करने (भूमंडलीकरण तथा आईटी क्रांति के चलते) तथा ज्ञान के समाज के संकट को दूर करने की जरूरत है क्योंकि यहां पर अनुशासन की सीमाएं निरर्थक हो जाती है। इस प्रकार से ज्ञान का सृजन उस प्रक्रिया से कहीं अधिक विशुद्ध है जो संकुचित सामाजिक स्वरूप अथवा एकल अनुशासन या एकल अनुभव के लिए अलगावादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है। श्रेष्ठता के भंडार के रूप में जाना जाने वाला विश्वविद्यालय, श्रेष्ठता के वास्ते या खुला ज्ञान के वास्ते तथा जानकारी के वास्ते ही बैद्धिकता का सृजन नहीं करती बल्कि इस के अतिरिक्त, विश्वविद्यालय, समुदायों, समाजों तथा व्यक्तियों की जरूतों को पुरा करने को बाध्य है। विश्वविद्यालय व्यक्तियों, समुदाय तथा समाज के सशक्त बनाने के लिए एजेंट बनने तथा साधक बनने के लिए समाज के प्रति ऋणी होता है। वृहद परिध संवैधानिक संस्कृति में प्रत्यक्षतः पूर्ण सर्म्पण के साथ अच्छा नागरिक बनाना विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी होती है। इसी तरह विश्वविद्यालय न्यायसंगत ज्ञान तथा शिक्षा देने के लिए बाध्य है। इस प्रकार से स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय रूप से शांति व समृद्धि के लिए विश्वविद्यालय का योगदान रहता है। शिक्षा तथा उच्च शिक्षा बहुमूल्य रहते हुए तथा लोगों के बीच बेहतर बनाने की इच्छा को ध्यान में रखते हुए हम हरियाणा के विश्वविद्यालय में बेहतर शिक्षा के लिए न्याय करते हुए प्रवेश का साधन बढ़ाने को बाध्य है, जो कि श्रेष्ठता का सृजन में प्रासंगिक हो तथा मददगार हो अंततः ऐसा नागरिक बनाने जो जिम्मेदार हो परावर्ती हो तथा संवेदशील हो।
प्रो. मूलचंद शर्मा
कुलपति